Friday, April 20, 2007

प्यार और पैसे की प्यास

यदि अक्षरों के संयोजन कि ओर ध्यान देवें तो पायेंगें कि प्यास, प्यार और पैसे की होना कुछ अनोखा नहीं लगता। बहुत बार यह विचार मन में आता है कि जो वस्तुएं प्रकृति ने बनायी हैं, उनमें ऐसा तारतम्य है, जैसा कहीँ और भी नहीं मिल सकता। कहानियो के सूत्र और रेशे इस तरह जुडते चलते हैं कि एक उपन्यास बन जता है। अगर आपने 'सूरज का सातवां घोड़ा' पढ़ा हो, तो आपके लिए प्रकृति के रचनाकर्म को समझना काफी आसान हो जाएगा।
यह विचारों कि नदी ही है जो बह कर बात को कहीँ से कहीँ ले जाती है। बात हो रही थी प्यार और पैसे की प्यास की। प्यास ना हो तो यह दुनिया ही ना हो, जिसे तृष्णा कह कर गौतम बुद्ध नामक महात्मा ने सारे दुखों कि जड़ बताया था। परंतु उन्ही दुखों के भंवर में मानव मात्र सुख की एक लहर तलाश करता आया है, और उस एक सुख की लहर की तलाश उसे आज मंगल ग्रह पर और खुद उसके दिमाग के भीतर भी ले कर चली आयी है। और, इन दोनों जगहों पर पहुंच कर भी वो खोया नहीं है, वो वहाँ मौजूद तमाम रहस्यों को सुलझाने कि कोशिश कर रहा है।
कौड़ी कौड़ी पैसे और टुकड़ों टुकडों प्यार के लिए हम किस तरह भागते रहते हैं, यह हमें पता भी नहीं रहता है। कुछ बावरों को पता चल जाता है, कि वो अज्ञात के पीछे बेवजह, बेसबब भाग रहे हैं, लेकिन फिर भी भागते रहते हैं। क्योंकि इसी भागने में असली सुख है। रोज़ हार कर वापस लौटना और फिर सुबह जीत की तलाश में निकलना ही कुछ लोगों को जिंदा होने का एहसास देता है। यह एहसास महसूस करना इतना जरूरी हो जाता है, कि हम अपनी पुरसुकून जिन्दगी को भी दांव पर लगा देते हैं।

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